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विभीषण का धर्म संकट: रावण त्याग कर राम का साथ क्यों चुना?

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विभीषण का धर्म संकट: रावण त्याग कर राम का साथ क्यों चुना?

रामायण में विभीषण का धर्म संकट एक ऐसी नैतिक दुविधा थी जहाँ उन्होंने अपने कुल और भाई का त्याग कर धर्म के पथ पर चलना चुना। यह लेख विभीषण के इस असाधारण निर्णय के पीछे के गहन आध्यात्मिक और नैतिक कारणों, और सनातन धर्म पर इसके दूरगामी प्रभावों की पड़ताल करता है।

अक्सर हम रामायण की कहानियों को सरलता से देखते हैं – राम अच्छे थे, रावण बुरा था। लेकिन क्या हर निर्णय इतना सीधा और सरल होता है? जब बात विभीषण की आती है, तो यह प्रश्न और भी गहरा हो जाता है। लंकाधिपति रावण का सगा छोटा भाई, अपने ही कुल का त्याग करके शत्रु पक्ष में शामिल हो जाता है – यह कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह केवल एक राजनीतिक या सामरिक चाल नहीं थी, बल्कि एक गहन नैतिक और आध्यात्मिक द्वंद्व का परिणाम था। विभीषण का यह कर्म, जिसे हम विभीषण का धर्म संकट कहते हैं, सनातन धर्म के सबसे जटिल और महत्वपूर्ण नैतिक पाठों में से एक है। आइए, मेरे साथ इस गहराई में उतरते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि एक भाई ने अपने रक्त संबंध से बड़ा धर्म क्यों चुना।

विभीषण का धर्म संकट: एक परिचय

लंका नगरी, सोने की चकाचौंध में डूबी, पर रावण के अहंकार और अधर्म की छाया तले कराह रही थी। इस नगरी में एक ऐसा प्राणी भी था, जिसने राक्षसी कुल में जन्म लेकर भी देवत्व के गुणों को आत्मसात किया था। वह था विभीषण। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति का, वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता, और धर्म के सिद्धांतों पर अटल विश्वास रखने वाला। जहां रावण बल, भोग और सत्ता के नशे में चूर था, वहीं विभीषण तपस्या, संयम और न्याय के मार्ग पर चलता था।

रावण के सभी भाइयों में, विभीषण शायद सबसे अनोखे थे। कुंभकर्ण जहां अपनी निद्रा और भयंकर युद्ध कौशल के लिए जाने जाते थे, वहीं विभीषण अपनी बुद्धि, विवेक और धार्मिकता के लिए। रावण ने अपनी शक्ति के बल पर तीनों लोकों पर आतंक मचा रखा था। उसने देवताओं को भी दास बना लिया था। लेकिन विभीषण कभी इस अधर्म का भागीदार नहीं बने। उनका हृदय हमेशा सत्य और न्याय के पक्ष में रहा। यह उनके चरित्र की एक मूलभूत विशेषता थी जो उन्हें अपने परिवार के बाकी सदस्यों से अलग करती थी। उनका जीवन हमें सिखाता है कि जन्म से कोई राक्षस नहीं होता, बल्कि कर्मों से बनता है। विभीषण ने यह सिद्ध किया कि चाहे आप किसी भी कुल या परिवेश में जन्म लें, आपका व्यक्तिगत धर्म ही आपकी पहचान बनाता है।

रावण के अहंकार और विनाश की ओर कदम

जब रावण ने छल से भगवान राम की पत्नी सीता का हरण किया, तब विभीषण का धर्म संकट अपने चरम पर पहुंच गया। यह केवल एक स्त्री का हरण नहीं था, यह धर्म, न्याय और नैतिकता का सीधा उल्लंघन था। रावण ने अपनी बहन शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के नाम पर यह अधर्मी कृत्य किया था, लेकिन विभीषण जानते थे कि इसका परिणाम कितना भयंकर हो सकता है। वे इस बात से भली-भांति परिचित थे कि यह एक ऐसे शक्तिशाली सम्राट से शत्रुता मोल लेना है, जो स्वयं धर्म का प्रतीक है। रामायण के कई प्रसंगों में हमें देखने को मिलता है कि विभीषण ने अपने भाई को बार-बार समझाया, चेतावनियां दीं, लेकिन रावण ने एक न सुनी। यह वही क्षण थे जहां विभीषण का व्यक्तिगत धर्म और कुल धर्म के बीच संघर्ष शुरू हुआ।

विभीषण का धर्म संकट: रावण त्याग कर राम का साथ क्यों चुना?

रावण के दरबार में धर्म की पुकार: विभीषण की चेतावनियाँ

विभीषण ने रावण के दरबार में रहते हुए भी कभी धर्म के मार्ग का त्याग नहीं किया। उन्होंने हमेशा सत्य का साथ दिया और रावण को सही मार्ग दिखाने का प्रयास किया। यह उनके अदम्य नैतिक साहस का प्रमाण है। सोचिए, एक ऐसे शक्तिशाली और क्रूर राजा के सामने सत्य बोलने की हिम्मत करना, जो अपने सामने किसी की नहीं सुनता! विभीषण ने यह बार-बार किया।

विभीषण की महत्वपूर्ण चेतावनियाँ:

  • सीता हरण के तुरंत बाद: जब रावण सीता को लंका लेकर आया, तो विभीषण ने उसे तुरंत चेतावनी दी कि यह कार्य विनाशकारी है। उन्होंने कहा कि सीता का हरण करके रावण ने काल को निमंत्रण दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि पराई स्त्री का अपहरण महापाप है और इसका अंत अत्यंत बुरा होता है।
  • हनुमान द्वारा लंका दहन के बाद: जब हनुमान ने अशोक वाटिका में सीता से भेंट की और उसके बाद पूरी लंका को जलाकर राख कर दिया, तब भी विभीषण ने रावण को समझाया। उन्होंने कहा कि एक साधारण वानर अगर इतना विध्वंस कर सकता है, तो राम और लक्ष्मण की शक्ति का अनुमान लगाना भी मुश्किल है। उन्होंने सलाह दी कि सीता को ससम्मान राम को लौटा दिया जाए और उनसे क्षमा याचना की जाए।
  • युद्ध से ठीक पहले: युद्ध की घोषणा से पहले, विभीषण ने अंतिम बार रावण को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं नारायण के अवतार हैं। उन्होंने रावण को अपने मंत्रियों और दरबारियों के सामने ही फटकारा कि वह अपने अहंकार में डूबकर लंका का विनाश कर रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि "जब विनाश काल आता है, तो मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।"

इन सभी अवसरों पर, रावण ने विभीषण की बात को अनसुना कर दिया, उनका उपहास किया और उन्हें कायर कहा। रावण का अहंकार इतना प्रचंड था कि वह अपने छोटे भाई की निष्पक्ष और बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह को भी स्वीकार नहीं कर पाया। रावण को यह बात समझ ही नहीं आई कि विभीषण का उद्देश्य उसे नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उसे और लंका को विनाश से बचाना था। रावण को लगा कि विभीषण उससे ईर्ष्या करता है, जबकि विभीषण केवल धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहा था। इस अस्वीकृति ने विभीषण के लिए कुल धर्म और सार्वभौमिक धर्म के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया।

कुल धर्म बनाम सार्वभौमिक धर्म: विभीषण का नैतिक संघर्ष

यह विभीषण का धर्म संकट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। हमारे समाज में 'कुल धर्म', 'वंश की मर्यादा' और 'भ्रातृत्व' को बहुत महत्व दिया जाता है। यह स्वाभाविक भी है। अपने परिवार और भाई-बहनों के प्रति निष्ठा रखना एक मूलभूत मानवीय गुण है। लेकिन क्या होगा जब कुल धर्म, सार्वभौमिक धर्म के विरुद्ध खड़ा हो जाए? जब परिवार का मुखिया अधर्म का मार्ग अपना ले और समस्त सृष्टि के लिए खतरा बन जाए?

विभीषण को इसी विकट परिस्थिति का सामना करना पड़ा। एक ओर उनके भाई रावण, जिनका त्याग करना कुल द्रोह माना जा सकता था। दूसरी ओर, धर्म के शाश्वत सिद्धांत, जिनकी रक्षा करना उनका व्यक्तिगत दायित्व था। विभीषण ने गहन चिंतन और मनन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि सार्वभौमिक धर्म (जो सत्य, न्याय और नैतिकता पर आधारित है) कुल धर्म (जो केवल रक्त संबंधों पर आधारित है) से ऊपर है।

सनातन धर्म में 'धर्म' का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक नैतिक और आध्यात्मिक तरीका है। इसमें सत्य, अहिंसा, न्याय, करुणा और कर्तव्यपरायणता जैसे मूल्य शामिल हैं। जब कोई व्यक्ति, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, इन मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, तो उसके विरुद्ध खड़े होना ही सच्चा धर्म है। विभीषण ने इसी सिद्धांत का पालन किया।

क्यों सार्वभौमिक धर्म सर्वोपरि है?

  • न्याय और सत्य की रक्षा: विभीषण जानते थे कि रावण का कार्य अन्यायपूर्ण था और सीता के प्रति किया गया पाप था। सत्य और न्याय की रक्षा किसी भी व्यक्तिगत संबंध से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • लोक कल्याण: रावण केवल सीता को ही पीड़ित नहीं कर रहा था, बल्कि उसके अहंकार और अधर्म से समस्त लोक त्रस्त थे। विभीषण ने लोक कल्याण को अपने व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर रखा।
  • अधर्म का नाश: धर्म की स्थापना के लिए अधर्म का नाश आवश्यक है। यदि विभीषण रावण का साथ देते रहते, तो वे परोक्ष रूप से उसके अधर्म में भागीदार बनते।
  • ईश्वर का विधान: विभीषण यह भी जानते थे कि राम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं, और उनका आगमन ही अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना के लिए हुआ है। ऐसे में राम का साथ देना ही ईश्वर के विधान का पालन करना था।

यह निर्णय लेना आसान नहीं था। इसके लिए अदम्य साहस, गहरी अंतर्दृष्टि और धर्म पर अटूट विश्वास की आवश्यकता थी। विभीषण ने अपने ही कुल और भाई को छोड़कर, उस मार्ग को चुना जो धर्म का था। उन्होंने दिखा दिया कि जब धर्म खतरे में हो, तो रक्त संबंध भी गौण हो जाते हैं। उनका यह कार्य 'आपद्धर्म' का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ विशेष परिस्थितियों में सामान्य नियमों से हटकर धर्म की रक्षा की जाती है।

विभीषण का धर्म संकट: रावण त्याग कर राम का साथ क्यों चुना?

शरणम रामम्: राम की शरण में क्यों?

जब रावण ने विभीषण को अपने दरबार से अपमानित कर निकाल दिया, तब विभीषण के पास दो ही रास्ते थे – या तो चुपचाप रावण के अधर्म का हिस्सा बनकर रहना, या फिर धर्म के संरक्षक भगवान राम की शरण में जाना। विभीषण ने दूसरा रास्ता चुना। यह सिर्फ एक राजनीतिक पलायन नहीं था, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक समर्पण था – शरणम रामम्

राम की शरण में जाने के कारण:

  • राम का धर्मपरायण चरित्र: विभीषण अच्छी तरह से जानते थे कि राम स्वयं धर्म के साक्षात स्वरूप हैं। राम ने अपने जीवन में हर कदम पर धर्म का पालन किया था, चाहे वह पिता के वचन के लिए वनवास हो, या प्रजा के कल्याण के लिए अपनी रानी का त्याग हो। ऐसे धर्मपरायण राजा की शरण में जाना, स्वयं धर्म की शरण में जाना था।
  • राम की शरणागत वत्सलता: भगवान राम का एक प्रमुख गुण है 'शरणागत वत्सलता' – अर्थात अपनी शरण में आए हुए किसी भी प्राणी की रक्षा करना, चाहे वह शत्रु का भाई ही क्यों न हो। जब विभीषण राम की शरण में आए, तो सुग्रीव जैसे कई लोगों ने संदेह व्यक्त किया कि वह रावण का जासूस हो सकता है। लेकिन राम ने अपनी सहज करुणा और धर्मपरायणता से विभीषण को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि जो एक बार भी "मैं तुम्हारा हूँ" कह कर शरण में आ जाता है, मैं उसे अभय दान देता हूँ।
  • प्रभु पर अटूट विश्वास: विभीषण को राम की दिव्यता और उनकी विजय पर पूर्ण विश्वास था। वे जानते थे कि अंततः राम ही अधर्म का नाश करेंगे और धर्म की स्थापना करेंगे। इसलिए, राम का साथ देना ही सत्य का साथ देना था।
  • धर्म की स्थापना का संकल्प: विभीषण का उद्देश्य केवल अपनी जान बचाना नहीं था, बल्कि लंका में धर्म की स्थापना करना भी था। वे जानते थे कि राम ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो इस महान कार्य को पूरा कर सकते हैं।

विभीषण का राम की शरण में जाना केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है। यह दर्शाता है कि जब हम अपने जीवन में धर्म और अधर्म के बीच दुविधा में होते हैं, तो हमें उस परम शक्ति की शरण लेनी चाहिए जो स्वयं धर्म का प्रतीक है। यह विश्वास का, समर्पण का और सही मार्ग चुनने का प्रतीक है। राम ने विभीषण को न केवल स्वीकार किया, बल्कि उसे लंका का राजा बनाने का भी वचन दिया, यह दिखाता है कि धर्म का साथ देने वाले को कभी निराश नहीं होना पड़ता।

त्याग का फल: लंका का राज और चिरंजीवी पद

विभीषण का निर्णय, जो उस समय कुल द्रोह जैसा प्रतीत हो सकता था, अंततः उनके लिए और लंका के लिए भी कल्याणकारी सिद्ध हुआ। उनका यह त्याग व्यर्थ नहीं गया। धर्म का मार्ग कठिन अवश्य होता है, पर उसका फल हमेशा मीठा होता है। विभीषण को उनके धर्मपरायणता और नैतिक साहस के लिए प्रभु राम से अनमोल वरदान प्राप्त हुए।

विभीषण को प्राप्त हुए वरदान और पद:

  • लंका का राज: रावण के वध के बाद, राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया। यह एक ऐसा पद था जिसके वे अपनी धार्मिक प्रवृत्ति और न्यायप्रियता के कारण वास्तव में हकदार थे। उन्होंने लंका में धर्म की स्थापना की और प्रजा का हितैषी बनकर राज किया।
  • चिरंजीवी पद: विभीषण को भगवान राम ने चिरंजीवी होने का वरदान दिया, अर्थात वे तब तक जीवित रहेंगे जब तक यह कल्प चलता रहेगा। यह उन सात या आठ चिरंजीवियों में से एक हैं जिन्हें अमरत्व प्राप्त है (जैसे अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, परशुराम, कृप और मार्कण्डेय)। यह उनके अद्वितीय धर्मनिष्ठता का सबसे बड़ा सम्मान था।
  • त्रिकालदर्शी ज्ञान: कई ग्रंथों में उल्लेख है कि विभीषण को त्रिकालदर्शी होने का भी वरदान मिला, जिससे वे भूत, वर्तमान और भविष्य को देख सकते थे। यह उनकी तपस्या और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का परिणाम था।
  • प्रभु राम का सानिध्य: सबसे बड़ा पुरस्कार तो स्वयं प्रभु राम का सानिध्य और स्नेह था। विभीषण को राम ने अपने मित्र के रूप में स्वीकार किया और उन्हें आजीवन सम्मान दिया।

विभीषण का जीवन यह सिखाता है कि धर्म का पालन करने वाले को कभी निराश नहीं होना पड़ता। भले ही शुरुआती दौर में त्याग और संघर्ष करना पड़े, पर अंततः धर्म की ही विजय होती है। उनका उदाहरण हमें बताता है कि सच्ची निष्ठा परिवार या व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि सत्य और धर्म के सिद्धांतों के प्रति होनी चाहिए। जो धर्म का साथ देता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। लंका में विभीषण का शासन न्याय और समृद्धि का प्रतीक बन गया, जो रावण के अत्याचार और अधर्म के शासन से बिल्कुल विपरीत था। उन्होंने लंका को पुनः एक धार्मिक और शांतिपूर्ण नगरी में परिवर्तित किया।

विभीषण का धर्म संकट: रावण त्याग कर राम का साथ क्यों चुना?

विभीषण का निर्णय: आज के संदर्भ में प्रासंगिकता

विभीषण की कहानी केवल रामायण का एक पात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म का एक शाश्वत संदेश है। आज भी, जब हम अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के धर्म संकटों का सामना करते हैं, तब विभीषण का निर्णय हमें प्रेरणा देता है। क्या यह कहानी आज हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी तब थी? मेरा मानना है, हाँ, बिल्कुल है।

विभीषण के निर्णय से आज के समय के लिए सीख:

  • नैतिक साहस का महत्व: विभीषण ने अपने परिवार और समाज के दबाव के बावजूद सत्य का साथ दिया। आज भी हमें अपने आसपास होने वाले गलत कामों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए नैतिक साहस की आवश्यकता है। चाहे वह भ्रष्टाचार हो, अन्याय हो या किसी प्रकार का शोषण, विभीषण हमें सिखाते हैं कि सही के लिए खड़े होना ही सच्चा धर्म है।
  • विवेकपूर्ण निर्णय लेना: जीवन में कई बार हमें ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जहाँ व्यक्तिगत लाभ और नैतिक सिद्धांतों के बीच टकराव होता है। विभीषण का उदाहरण हमें सिखाता है कि हमें हमेशा विवेक का उपयोग करना चाहिए और वह मार्ग चुनना चाहिए जो अंततः धर्म और लोक कल्याण के लिए हो।
  • अधर्म का त्याग: यह जरूरी नहीं कि अधर्म हमेशा किसी बड़े राक्षस द्वारा किया जाए। अधर्म हमारे अपने अंदर या हमारे आसपास छोटे-छोटे रूपों में भी मौजूद हो सकता है। विभीषण ने दिखाया कि अधर्म को त्यागना और उससे दूरी बनाना ही धर्म की ओर पहला कदम है।
  • सार्वभौमिक सिद्धांतों की सर्वोच्चता: कुल, वंश, समुदाय या किसी विशेष समूह के प्रति निष्ठा महत्वपूर्ण है, लेकिन ये सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों जैसे न्याय, सत्य और करुणा से ऊपर नहीं हो सकते। विभीषण ने इस बात को स्पष्ट रूप से स्थापित किया।
  • परिणाम की चिंता किए बिना धर्म का पालन: विभीषण को पता नहीं था कि राम उन्हें स्वीकार करेंगे या नहीं, या उनका क्या होगा। फिर भी उन्होंने अपने धर्म का पालन किया। यह हमें सिखाता है कि हमें सही काम करना चाहिए, परिणाम की चिंता किए बिना, क्योंकि धर्म हमेशा अपनी रक्षा करता है।

विभीषण की कहानी हमें यह समझने में मदद करती है कि धर्म का पालन केवल कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के हर निर्णय, हर व्यवहार और हर संबंध में निहित है। उनका धर्म संकट केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की कहानी नहीं, बल्कि मानव समाज के लिए एक चिरस्थायी नैतिक मार्गदर्शक है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्ची शक्ति विवेक में है, और सच्चा सम्मान धर्म के पालन में।

Key Takeaways

  • धर्म सर्वोपरि है: विभीषण के निर्णय ने सिद्ध किया कि सार्वभौमिक धर्म कुल, रक्त संबंध और व्यक्तिगत निष्ठा से भी ऊपर है।
  • अधर्म का साथ देना स्वयं अधर्म है: यदि आप अधर्मी का समर्थन करते हैं, तो आप भी उसके पापों में भागीदार बनते हैं, भले ही आप स्वयं अधर्म न करें।
  • विवेकपूर्ण निर्णय ही सच्ची निष्ठा है: जटिल परिस्थितियों में, सत्य और न्याय के आधार पर लिया गया विवेकपूर्ण निर्णय ही वास्तविक निष्ठा का प्रमाण होता है।
  • सच्ची शरण शरणागत वत्सल प्रभु राम में ही है: जब धर्म और अधर्म के बीच चुनाव करना हो, तो प्रभु राम जैसे धर्मपरायण व्यक्ति या सिद्धांतों की शरण लेना ही सही मार्ग है।
  • नैतिक साहस कभी व्यर्थ नहीं जाता: विभीषण के नैतिक साहस का फल उन्हें चिरंजीवी पद और लंका के राज के रूप में मिला, यह दर्शाता है कि धर्म का मार्ग अंततः विजय दिलाता है।

Frequently Asked Questions

विभीषण को धर्म संकट क्यों आया था?

रावण के अधर्मी मार्ग और सीता हरण के बाद, विभीषण को अपने भाई रावण के प्रति कुल निष्ठा और धर्म के सार्वभौमिक सिद्धांतों (जैसे न्याय, सत्य और लोक कल्याण) के बीच एक तीव्र नैतिक दुविधा का सामना करना पड़ा। रावण ने उनकी सभी चेतावनियों को अनसुना कर दिया, जिससे उनके लिए कोई और विकल्प नहीं बचा।

विभीषण ने रावण का त्याग कर राम का साथ क्यों दिया?

विभीषण ने रावण को अनेक बार धर्म का मार्ग दिखाया और सीता को लौटाने की सलाह दी, परंतु जब रावण ने सभी चेतावनियों को अनसुना कर दिया और अधर्म पर अडिग रहा, तब विभीषण ने यह समझ लिया कि रावण का साथ देना स्वयं अधर्म में भागीदार बनना है। इसलिए, उन्होंने सार्वभौमिक धर्म की रक्षा और सत्य की स्थापना हेतु भगवान राम की शरण ली, जो स्वयं धर्म के प्रतीक थे।

विभीषण के निर्णय का क्या महत्व है?

यह निर्णय दर्शाता है कि धर्म कुल, रक्त संबंध और व्यक्तिगत निष्ठा से भी बड़ा है। यह नैतिक साहस, विवेक और अधर्म के विरुद्ध खड़े होने के महत्व पर प्रकाश डालता है। विभीषण ने यह स्थापित किया कि यदि आपका परिवार या नेता अधर्म का मार्ग अपनाता है, तो आपका कर्तव्य है कि आप धर्म का साथ दें, भले ही इसके लिए आपको व्यक्तिगत त्याग करना पड़े।

क्या विभीषण का कार्य कुल द्रोह था?

रामायण और सनातन धर्म के सिद्धांतों के अनुसार, नहीं। विभीषण ने रावण के अधर्म का त्याग किया, न कि अपने कुल का। उन्होंने रावण को सही मार्ग पर लाने की हर संभव कोशिश की थी। जब रावण ने बात नहीं मानी, तो विभीषण ने धर्म की स्थापना में योगदान दिया, जो अंततः लंका और उनके कुल के लिए भी कल्याणकारी सिद्ध हुआ। उनका कार्य कुल का विनाश नहीं, बल्कि उसे अधर्म से बचाना था।

मुझे उम्मीद है कि विभीषण का धर्म संकट पर यह गहन पड़ताल आपको पसंद आई होगी और आपको धर्म के सूक्ष्म सिद्धांतों को समझने में मदद मिली होगी। ऐसे ही और गहरे, अनछुए और प्रेरणादायक पौराणिक विषयों पर चर्चा के लिए, हमें सोशल मीडिया पर @sanatansagatv पर फॉलो करना न भूलें!

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